राजस्व विभाग की जाँच रिपोर्ट में बड़ा खुलासा,सरकारी ज़मीन पर अवैध कब्जा कर संचालित हो रहा राज्यानुदानित मदरसा दारुल उलूम पीरबटावन बाराबंकी
बिना मानचित्र स्वीकृति भवन, फिर भी मान्यता और सरकारी अनुदान—वर्षों से कैसे चलता रहा पूरा खेल ?
लखनऊ। नगर पालिका परिषद नवाबगंज जनपद बाराबंकी क्षेत्र के बीचों-बीच संचालित राज्यानुदानित मदरसा दारुल उलूम पीरबटावन बाराबंकी की मान्यता और सरकारी अनुदान को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। उपलब्ध नगर पालिका एवं राजस्व विभाग की जांच रिपोर्टों ने मदरसे की भूमि और भवन से जुड़े उन तथ्यों को सामने रखा है, जिनसे वर्षों से चली आ रही विभागीय सत्यापन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लग गया है। तहसीलदार नवाबगंज जनपद बाराबंकी की जाँच रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से संबंधित जमीन को सरकारी जमीन बताया गया है।
राजस्व अभिलेखों में जमीन ‘मिल्कियत सरकार’
तहसीलदार नवाबगंज की जांच रिपोर्ट में मदरसे से संबंधित भूमि को गाटा संख्या-46, मिल्कियत सरकार, खाता/खेवट संख्या-1, जेरे इंतजाम म्यूनिसिपल बोर्ड, श्रेणी 9(2)-आबादी, सड़क, भवन आदि के अंतर्गत दर्ज बताया गया है।
यानी उपलब्ध राजस्व अभिलेखों के मुताबिक जिस भूमि पर मदरसा संचालित है, वह मदरसा अथवा उसकी संचालक संस्था, सोसाइटी या ट्रस्ट के नाम दर्ज निजी स्वामित्व वाली भूमि के रूप में सामने नहीं आती।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल उठता है—
> अगर जमीन सरकारी/नगरपालिका अभिलेखों में दर्ज है, तो मदरसे को निजी भूमि और भवन संबंधी मान्यता की पात्रता किस आधार पर मिली ?
नगर पालिका की जांच में भी मानचित्र स्वीकृति पर सवाल
नगर पालिका परिषद नवाबगंज की जांच रिपोर्ट में भी मदरसा भवन के संबंध में आवश्यक मानचित्र स्वीकृति उपलब्ध न होने का तथ्य सामने आया है।
ऐसे में सवाल यह है कि जिस भवन का मानचित्र स्वीकृत नहीं है और जिस भूमि के स्वामित्व को लेकर राजस्व अभिलेख सरकारी/नगरपालिका संपत्ति की ओर इशारा कर रहे हैं, उस भवन को वर्षों तक मान्यता और सरकारी अनुदान की पात्रता कैसे मिलती रही ?
मान्यता नियमों के पालन पर उठे गंभीर सवाल
मदरसा नियमावली 1987 और उत्तर प्रदेश अशासकीय अरबी एवं फारसी मदरसा मान्यता, प्रशासन और सेवा विनियमावली, 2016 में मदरसे के भवन तथा भूमि के संबंध में निर्धारित शर्तें हैं। स्थायी मान्यता के संदर्भ में संस्था/संचालक सोसाइटी अथवा ट्रस्ट के स्वामित्व वाली भूमि/भवन से संबंधित प्रावधान भी महत्वपूर्ण हैं।
ऐसे में राजस्व रिकॉर्ड और नगर पालिका की रिपोर्ट सामने आने के बाद मदरसे की मूल मान्यता पत्रावली की जांच जरूरी हो गई है।
दशकों से सत्यापन कौन करता रहा ?
मामले का सबसे सनसनीखेज पहलू यह है कि यदि मदरसा वर्षों से सरकारी अनुदान प्राप्त करता रहा और प्रत्येक वर्ष विभागीय स्तर पर उसका सत्यापन होता रहा, तो फिर संबंधित अधिकारियों की नजर सरकारी भूमि और भवन की वास्तविक स्थिति पर क्यों नहीं पड़ी ?
क्या सत्यापन के दौरान—
भूमि के स्वामित्व की जांच नहीं की गई ?
भवन का मानचित्र देखा नहीं गया ?
राजस्व अभिलेखों का मिलान नहीं किया गया ?
मान्यता की मूल शर्तों की पुष्टि नहीं की गई ?
या फिर सत्यापन प्रक्रिया महज कागजी खानापूर्ति बनकर रह गई ?
सरकारी खजाने से वर्षों तक अनुदान, अब जांच की मांग
यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि मान्यता की आवश्यक शर्तें पूरी नहीं थीं और इसके बावजूद मदरसे को सरकारी अनुदान मिलता रहा, तो केवल मदरसे की मान्यता का ही नहीं बल्कि वर्षों में स्वीकृत एवं वितरित सरकारी धन की भी विस्तृत जांच आवश्यक होगी।
इसके साथ ही यह भी तय करना होगा कि मान्यता, सत्यापन और अनुदान स्वीकृति की प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों ने किन दस्तावेजों के आधार पर संस्था को पात्र घोषित किया।
‘मदरसा सिंडिकेट’ की भूमिका की भी उठी जांच की मांग
मामले में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि सरकारी भूमि और भवन संबंधी वास्तविक स्थिति के बावजूद यदि लगातार मान्यता एवं अनुदान की प्रक्रिया चलती रही, तो इसके पीछे विभागीय स्तर पर मिलीभगत की संभावना की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
हालांकि इन आरोपों की पुष्टि सक्षम जांच एजेंसी द्वारा किया जाना अभी बाकी है।
अपर मुख्य सचिव गृह से उच्चस्तरीय जांच की मांग
प्रकरण में अपर मुख्य सचिव, गृह विभाग, उत्तर प्रदेश शासन को भेजे गए प्रार्थना पत्र में मांग की गई है कि-
मदरसे की मान्यता एवं सरकारी अनुदान की तत्काल समीक्षा की जाए।
राजस्व, नगर पालिका एवं अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के अभिलेखों का संयुक्त मिलान कराया जाए।
पिछले वर्षों की सभी सत्यापन रिपोर्टों की विशेष जांच हो।
गलत अथवा भ्रामक सत्यापन करने वाले अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जाए।
सरकारी धन के भुगतान की पूरी जांच कराई जाए।
यदि अयोग्यता अथवा गलत तथ्यों के आधार पर अनुदान प्राप्त होना सिद्ध हो तो नियमानुसार वसूली की जाए।
आपराधिक कृत्य पाए जाने पर एफआईआर एवं अन्य दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
जांच ऐसे अधिकारी से कराई जाए, जो पूर्व में मदरसे की मान्यता, सत्यापन अथवा अनुदान प्रक्रिया से जुड़ा न रहा हो।
अब सबसे बड़ा सवाल—सरकारी जमीन पर मान्यता किस आधार पर ?
बाराबंकी शहर के बीचों-बीच स्थित इस राज्यानुदानित मदरसे को लेकर सामने आई राजस्व और नगर पालिका की रिपोर्टों ने प्रशासनिक व्यवस्था के सामने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं।
सरकारी जमीन का रिकॉर्ड मौजूद था तो विभागीय सत्यापन में इसकी पड़ताल क्यों नहीं हुई ?
मानचित्र स्वीकृति का अभाव था तो भवन को मान्यता कैसे मिली ?
यदि सब कुछ नियमानुसार था तो राजस्व एवं नगर पालिका की रिपोर्टों में सामने आए तथ्यों की स्थिति क्या है ?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या वर्षों से सरकारी अनुदान प्राप्त करने वाले इस मदरसे की मान्यता और अनुदान प्रक्रिया की कभी वास्तविक, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हुई ?
अब निगाहें उत्तर प्रदेश शासन, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग, जिला प्रशासन और संबंधित जांच एजेंसियों पर हैं। सरकारी अभिलेखों में दर्ज तथ्यों पर यदि तत्काल निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो यह मामला केवल एक मदरसे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी भूमि, सरकारी धन और विभागीय सत्यापन व्यवस्था की जवाबदेही का बड़ा सवाल बन जाएगा।

