उत्तर प्रदेश

अनुदानित मदरसों को अब “हाई” चुनौती, अनुदान व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए मामला पहुँचा हाईकोर्ट

 

लखनऊ (राज्य ब्यूरो)। सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों की मान्यता निलंबित होते ही सामान्यतः उनका अनुदान और वेतन भुगतान भी स्थगित कर दिया जाता है, क्योंकि मान्यता और अनुदान को प्रशासनिक व विधिक रूप से परस्पर जुड़ा माना जाता है। माध्यमिक शिक्षा और बेसिक शिक्षा विभागों में यह व्यवस्था स्पष्ट रूप से लागू होती रही है, जहाँ मान्यता निलंबन के साथ ही वित्तीय सहायता रोक दी जाती है। हालांकि, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के अंतर्गत संचालित सहायता प्राप्त मदरसों को लेकर अब अलग स्थिति सामने आने के आरोप लगाए जा रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार जिन मदरसों की मान्यता निलंबित है, वहाँ भी वेतन भुगतान जारी रखने या उसकी तैयारी किए जाने की चर्चा है, जिससे वित्तीय अनुशासन और अनुदान व्यवस्था की पारदर्शिता पर प्रश्न उठने लगे हैं। आरोप है कि करदाताओं के धन से संचालित इस व्यवस्था में नियमों के समान अनुपालन को लेकर भिन्न व्यवहार देखने को मिल रहा है। जिसके बाद अनुदानित मदरसों को एक बार फिर हाईकोर्ट में “हाई” चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि मान्यता निलंबित होने के बाद अनुदान दिया जाना वित्तीय अनियमितता है। मदरसा अनुदान संबंधी शासनादेश में उल्लेख है कि मदरसे की स्थायी मान्यता होना अनुदान के लिए अनिवार्य शर्त है।

इसी मुद्दे को लेकर उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में एक जनहित याचिका दायर किए जाने की जानकारी सामने आई है। बताया जा रहा है कि यह मामला मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष 16 तारीख को सुनवाई के लिए निर्धारित है, जहाँ मान्यता निलंबन और वेतन भुगतान के बीच संबंध तथा सरकारी धन के उपयोग की वैधानिकता पर प्रश्न उठाए गए हैं।

वहीं, विधान परिषद में नियम 110 के अंतर्गत दो सदस्यों द्वारा प्रश्न उठाए जाने की भी चर्चा है, जिसे विभागीय स्तर पर स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। इस घटनाक्रम से प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में भी हलचल तेज हो गई है।

सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र स्थित एक मदरसा—जामिया इस्लामिया मदनपुरा वाराणसी का मामला भी चर्चा में है, जिसकी मान्यता दोबारा निलंबित होने की बात कही जा रही है। इसके बावजूद वहाँ वेतन भुगतान की तैयारी होने के आरोप सामने आए हैं। यदि यह तथ्य आधिकारिक रूप से प्रमाणित होते हैं, तो अनुदान व्यवस्था, विभागीय निगरानी और वित्तीय जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े हो सकते हैं।

पूरे प्रकरण ने यह बहस तेज कर दी है कि क्या सहायता प्राप्त सभी शैक्षणिक संस्थानों के लिए मान्यता निलंबन की स्थिति में एक समान नीति लागू हो रही है या नहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में स्पष्ट दिशानिर्देश, पारदर्शी वित्तीय प्रक्रिया और प्रभावी निगरानी तंत्र आवश्यक है, ताकि सरकारी धन का उपयोग नियमों के अनुरूप और जवाबदेह तरीके से सुनिश्चित किया जा सके।

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