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अवकाश के बावजूद फील्ड में उतरे प्रियंक कानूनगो,BLK Max अस्पताल की अमानवीय वसूली पर त्वरित कार्रवाई

नई दिल्ली। जब अधिकतर दफ्तरों में सरकारी अवकाश का सन्नाटा था, तब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भारत सरकार के सदस्य प्रियंक कानूनगो इंसाफ़ की लड़ाई में फील्ड पर मौजूद थे। राजधानी दिल्ली के प्रतिष्ठित BLK Max अस्पताल में सामने आए एक बेहद संवेदनशील और अमानवीय मामले में उन्होंने बिना समय गंवाए प्रत्यक्ष हस्तक्षेप किया।

मध्यप्रदेश से इलाज के लिए आए एक मरीज की भर्ती के महज़ 24 घंटे के भीतर मौत हो गई। परिजनों ने पहले ही 2 लाख रुपये जमा कर दिए थे, इसके बावजूद अस्पताल प्रशासन ने मरीज की मृत्यु के बाद 1 लाख रुपये की नाजायज मांग शुरू कर दी। आरोप है कि रकम न देने पर अस्पताल ने मृतक की देह को अपने कब्ज़े में रखकर परिजनों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया।

मामले की सूचना मिलते ही, सरकारी अवकाश के बावजूद प्रियंक कानूनगो स्वयं BLK Max अस्पताल पहुंचे। उन्होंने अस्पताल के प्रशासनिक अधिकारियों को मानवाधिकार कानूनों, संवैधानिक मूल्यों और भारत सरकार के स्पष्ट निर्देशों की कड़ी समझाइश दी और मृतक का शव तत्काल परिजनों को सौंपने का दबाव बनाया।

प्रियंक कानूनगो के निर्देश पर आयोग के असिस्टेंट रजिस्ट्रार बृजवीर सिंह, सहयोगी राहुल, पुलिस उपायुक्त सेंट्रल हर्षवर्धन मित्तल तथा SHO सुभाष चंद्र ने समन्वित कार्रवाई की। प्रशासनिक हस्तक्षेप और कानूनी दबाव के बाद अस्पताल को पीछे हटना पड़ा और अंततः मृतक की देह परिजनों को सौंपी गई।

प्रियंक कानूनगो ने दो टूक कहा कि “अस्पताल सेवा और संवेदना के लिए होते हैं, न कि मुनाफ़ाखोरी और ब्लैकमेलिंग के लिए। मृत देह को बंधक बनाना मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है।”

उन्होंने मृत आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हुए अस्पताल प्रबंधन को चेताया कि इस प्रकार की पाश्विक प्रवृत्तियाँ न केवल नैतिक अपराध हैं बल्कि कानून के कठघरे में भी लाने योग्य हैं।

यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि जब सिस्टम छुट्टी पर होता है, तब भी मानवाधिकार की ड्यूटी कभी अवकाश नहीं लेती—और प्रियंक कानूनगो इसका जीवंत उदाहरण हैं।

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