राष्ट्रपति भवन से कामिल-फाज़िल पर बजा खतरे का अलार्म! याचिका केंद्र के दो बड़े मंत्रालयों को भेजी गई
2004 से डिग्रियों की वैधानिकता पर उठे सवाल ने पकड़ा तूल, राष्ट्रपति सचिवालय ने अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय और उच्च शिक्षा विभाग को भेजी याचिका
लखनऊ। उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड की कामिल-फाजिल डिग्रियों की वैधानिकता को लेकर उठाया गया सवाल अब सीधे केंद्र सरकार के दरवाजे तक पहुंच गया है। राष्ट्रपति सचिवालय ने 18 अगस्त 2026 को दाखिल याचिका पर संज्ञान लेते हुए उसे केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय और उच्च शिक्षा विभाग को अग्रसारित कर दिया है। राष्ट्रपति सचिवालय ने संबंधित विभागों से मामले पर उचित ध्यान देने के साथ की गई कार्रवाई की सूचना सीधे याचिकाकर्ता को देने को कहा है।
यानी मामला अब सिर्फ उत्तर प्रदेश के मदरसा बोर्ड और राज्य सरकार तक सीमित नहीं रहा—केंद्र के दो महत्वपूर्ण विभागों की निगाह भी इस विवाद पर टिक गई है।
निशाने पर 2004 से चली आ रही व्यवस्था
याचिका में सीधा सवाल उठाया गया है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने 05 नवंबर 2024 के फैसले में मदरसा एक्ट के उन प्रावधानों को असंवैधानिक माना है, जो Fazil और Kamil जैसी उच्च शिक्षा की डिग्रियों को नियंत्रित करते हैं, तो इसका प्रभाव केवल 2024 के फैसले तक सीमित क्यों माना जाए?
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया गया है कि संबंधित निर्णय को कहीं भी prospective यानी केवल भविष्य के लिए लागू नहीं बताया गया है। इसी आधार पर याचिका में दावा किया गया है कि कामिल-फाजिल डिग्रियों की संवैधानिक वैधता का सवाल 03 सितंबर 2004 से उठता है।
अब सवाल डिग्री से आगे-नौकरी और वेतन तक
मामला यहीं खत्म नहीं होता। याचिका में 21 नवंबर 2024 के आजमगढ़ मंडल के उपनिदेशक, अल्पसंख्यक कल्याण के पत्र का भी हवाला दिया गया है, जिसमें कामिल-फाजिल डिग्रीधारी शिक्षकों की सरकारी सेवा और वेतन भुगतान को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए थे। याचिका के अनुसार इसके बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।
ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यह बनता है कि यदि केंद्र सरकार के स्तर पर इस कानूनी तर्क को गंभीरता से लिया जाता है, तो 2004 से चली आ रही डिग्री, नियुक्ति और सेवा संबंधी व्यवस्थाओं की वैधानिक स्थिति का क्या होगा ?
राष्ट्रपति सचिवालय ने गेंद केंद्र के पाले में डाली
राष्ट्रपति सचिवालय के अवर सचिव कुलचंद्र कुमार की ओर से भेजे गए जवाब में याचिका को संबंधित मंत्रालयों को “appropriate attention” के लिए भेजा गया है और कार्रवाई की सूचना याचिकाकर्ता को सीधे देने को कहा गया है।
याचिका में राष्ट्रपति से मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का अनुपालन सुनिश्चित करते हुए कामिल-फाजिल डिग्रियों को 03 सितंबर 2004 से असंवैधानिक घोषित करने तथा अग्रेतर कार्रवाई की जाए।
अब नजर मंत्रालयों के अगले कदम पर
राष्ट्रपति भवन से याचिका के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय और उच्च शिक्षा विभाग तक पहुंचने के बाद मामला नए मोड़ पर है। अब देखना होगा कि दोनों केंद्रीय विभाग इस याचिका में उठाए गए 2004 से प्रभाव, डिग्रियों की वैधानिकता तथा सरकारी सेवा-वेतन से जुड़े सवालों पर क्या जवाब देते हैं।
फिलहाल इतना तय है—कामिल-फाजिल का मुद्दा फिर गर्म है और इस बार दस्तक सीधे राष्ट्रपति भवन से निकलकर केंद्र सरकार के दो अहम मंत्रालयों तक पहुंची है।

